'जब तक पुराने नियम समझते हैं, तब तक...', व्यापारियों के लिए क्यों झंझट बना GST?
'जब तक पुराने नियम समझते हैं, तब तक...', व्यापारियों के लिए क्यों झंझट बना GST?
जीएसटी प्रणाली लागू होने से कारोबारियों को उम्मीद थी कि लालफीताशाही के दौर से मुक्ति और एक सुगम तथा किफायती व्यवस्था मिल जाएगी मगर जीएसटी प्रणाली लागू होने के बावजूद व्यापारी-कारोबारी जीएसटी नियम में हो हर महीने हो रहे बदलाव से परेशान हैं। कारोबार-व्यापार से जुड़े लोगों के जीएसी प्रणाली में हो रहे लगातार बदलाव पर चिंता जाहिर की है।
GST News: जीएसटी नियम में हर महीने हो रहे बदलाव से परेशान हो रहे व्यापारी।(फोटो सोर्स: जागरण)
30 जून-01 जुलाई, 2017 की मध्य रात्रि को संसद की संयुक्त बैठक में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में देश में कर ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव का घंटा बजाया तो यह माना गया कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से जुड़े हजारों टैक्स अधिकारियों की नींद टूट जाएगी।
साथ ही जीएसटी प्रणाली लागू होने से कारोबारियों को लालफीताशाही के दौर से मुक्ति और एक सुगम तथा किफायती व्यवस्था मिल जाएगी और उन पर टैक्स संबंधी बोझ कम होगा। मगर जीएसटी प्रणाली लागू होने के करीब आठ साल होने के बावजूद व्यापारी-कारोबारी जीएसटी नियम में हर महीने हो रहे बदलाव से लेकर विभागीय कर्मचारियों के बर्ताव से परेशान और क्षुब्ध दिखाई दे रहे हैं।
नियमों में लगातार होने वाले बदलाव और एक ही प्रकार के उत्पादों पर अलग-अलग जीएसटी की दरें होने से कारोबारियों से जीएसटी रिटर्न भरने में गलती हो जाती है और फिर उन्हें नोटिस से लेकर अन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। जीएसटी के कई जटिल प्रविधानों को समझने के लिए कारोबारी विशेषज्ञों का सहारा लेने को बाध्य हो रहे हैं जिसकी एवज में उन्हें मोटी फीस चुकानी पड़ रही है।
क्या है कारोबारियों की शिकायत?
कारोबार-व्यापार से जुड़े लोगों के अनुसार इसे छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ रही है। कारोबारियों की शिकायत है कि वे पूरे माह जीएसटी रिटर्न भरने में लगे रहते हैं अन्यथा लाखों की देनदारी का नोटिस आ जाता है।
कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के अध्यक्ष बी.सी. भरतिया कहते हैं,''महीने के 10 तारीख को पहला रिटर्न भरो, 12-13 तारीख तक उस रिटर्न का विभाग से जवाब आता है, फिर उसे वेरिफाइ करो और फिर 20 तारीख को फाइनल रिटर्न भरो। एक-एक बिक्री और एक-एक खरीद को रजिस्टर करना होता है। आपदा या विशेष परिस्थिति में अगर 20 तारीख तक जीएसटीआर दाखिल नहीं किया गया तो सिस्टम अपने आप जुर्माना लगा देता है। फिर उसे वापस लेने के लिए चक्कर लगाओ।“
भरतिया कहते हैं,
जब जीएसटी प्रणाली लागू हुई थी तो उन्हें यह बताया गया था कि पूरे देश के व्यापारी सिर्फ अपनी-अपनी बिक्री की जानकारी सरकार को देंगे। इससे सरकार के पास खरीदारी का पूरा ब्योरा अपने-आप आ जाएगा। कारोबारियों के मुताबिक साधारण पापकार्न की जीएसटी दरें और चाकलेटी क्रीम लगे पापकार्न की जीएसटी दरें अलग-अलग है। रोटी की दर अलग है तो पराठे की अलग। अलग-अलग बन और बटन लेने पर जीएसटी दर कम है और दोनों को साथ मिलाने पर यह दर बढ़ जाती है। इस प्रकार की भ्रामक स्थिति में कारोबारी गलत रिटर्न भर देते हैं और फिर उन्हें देनदारी का नोटिस आ जाता है और विभागीय कर्मचारी कारोबारियों के पीछे पड़ जाते हैं।
कारोबारियों को आ रही इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलने में समस्याएंकारोबारियों के मुताबिक शुरू में जीएसटी का प्रारूप साधारण था, लेकिन टैक्स चोरी पकड़ने के नाम पर इनमें नए-नए प्रविधान जुड़ते चले गए। व्यापारियों की सबसे बड़ी समस्या इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलने में हो रही दिक्कतों को लेकर है।
कोई कारोबारी किसी दूसरे कारोबारी से माल खरीदता है और दूसरा कारोबारी अगर समय पर जीएसटी रिटर्न नहीं भरता है तो पहले कारोबारी का इनपुट टैक्स रिटर्न फंस जाता है। अगर दूसरा कारोबारी फ्राड निकल जाता है तो भी पहले कारोबारी को इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिल पाता है।
कारोबारियों की शिकायत है जो कारोबारी फ्राड कर रहे हैं या जीएसटी रिटर्न फाइल नहीं कर रहे हैं, उन्हें भी सरकार ने ही जीएसटी व्यवस्था में पंजीकृत किया है, फिर इसमें उनकी क्या गलती है कि उनका इनपुट टैक्स क्रेडिट रोक लिया जाता है।
'जब तक पुराने नियम समझते हैं, तब तक नए नियम आ जाते हैं'दिल्ली सदर बाजार व्यापारी संघ के अध्यक्ष देवराज बवेजा कहते हैं, “पिछले आठ सालों में सैकड़ों नियम बदल चुके हैं और जब तक व्यापारी पुराने नियम को समझता है, नए नियम आ जाते हैं। एचएस कोड को भी समझना छोटे व्यापारियों के लिए परेशानी की बात है।“
असल में जिन वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होता है, उन सभी का हार्मोनाइज्ड सिस्टम या एचएस कोड तय किया जाता है और उन वस्तुओं की जीएसटी दरें भी एचएस कोड के हिसाब से तय होती है।
टैक्स एक्सपर्ट और चार्टर्ड एकाउंटेंट एम.के. गुप्ता कहते हैं कि पहले कारोबारियों के जीएसटी का ऑडिट अनिवार्य था। अब ऑडिट की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। ऐसे में कारोबारी गलती कर बैठते हैं और दो-तीन साल पुरानी गलती से जुड़े उन्हें नोटिस आ रहे हैं तथा उनकी परेशानियों में इजाफा कर रहे हैं।
जीएसटी प्रणाली लागू होने से कारोबारियों को उम्मीद थी कि लालफीताशाही के दौर से मुक्ति और एक सुगम तथा किफायती व्यवस्था मिल जाएगी मगर जीएसटी प्रणाली लागू होने के बावजूद व्यापारी-कारोबारी जीएसटी नियम में हो हर महीने हो रहे बदलाव से परेशान हैं। कारोबार-व्यापार से जुड़े लोगों के जीएसी प्रणाली में हो रहे लगातार बदलाव पर चिंता जाहिर की है।

30 जून-01 जुलाई, 2017 की मध्य रात्रि को संसद की संयुक्त बैठक में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में देश में कर ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव का घंटा बजाया तो यह माना गया कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से जुड़े हजारों टैक्स अधिकारियों की नींद टूट जाएगी।
साथ ही जीएसटी प्रणाली लागू होने से कारोबारियों को लालफीताशाही के दौर से मुक्ति और एक सुगम तथा किफायती व्यवस्था मिल जाएगी और उन पर टैक्स संबंधी बोझ कम होगा। मगर जीएसटी प्रणाली लागू होने के करीब आठ साल होने के बावजूद व्यापारी-कारोबारी जीएसटी नियम में हर महीने हो रहे बदलाव से लेकर विभागीय कर्मचारियों के बर्ताव से परेशान और क्षुब्ध दिखाई दे रहे हैं।
नियमों में लगातार होने वाले बदलाव और एक ही प्रकार के उत्पादों पर अलग-अलग जीएसटी की दरें होने से कारोबारियों से जीएसटी रिटर्न भरने में गलती हो जाती है और फिर उन्हें नोटिस से लेकर अन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। जीएसटी के कई जटिल प्रविधानों को समझने के लिए कारोबारी विशेषज्ञों का सहारा लेने को बाध्य हो रहे हैं जिसकी एवज में उन्हें मोटी फीस चुकानी पड़ रही है।
क्या है कारोबारियों की शिकायत?
कारोबार-व्यापार से जुड़े लोगों के अनुसार इसे छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ रही है। कारोबारियों की शिकायत है कि वे पूरे माह जीएसटी रिटर्न भरने में लगे रहते हैं अन्यथा लाखों की देनदारी का नोटिस आ जाता है।
कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के अध्यक्ष बी.सी. भरतिया कहते हैं,''महीने के 10 तारीख को पहला रिटर्न भरो, 12-13 तारीख तक उस रिटर्न का विभाग से जवाब आता है, फिर उसे वेरिफाइ करो और फिर 20 तारीख को फाइनल रिटर्न भरो। एक-एक बिक्री और एक-एक खरीद को रजिस्टर करना होता है। आपदा या विशेष परिस्थिति में अगर 20 तारीख तक जीएसटीआर दाखिल नहीं किया गया तो सिस्टम अपने आप जुर्माना लगा देता है। फिर उसे वापस लेने के लिए चक्कर लगाओ।“
भरतिया कहते हैं,
जब जीएसटी प्रणाली लागू हुई थी तो उन्हें यह बताया गया था कि पूरे देश के व्यापारी सिर्फ अपनी-अपनी बिक्री की जानकारी सरकार को देंगे। इससे सरकार के पास खरीदारी का पूरा ब्योरा अपने-आप आ जाएगा। कारोबारियों के मुताबिक साधारण पापकार्न की जीएसटी दरें और चाकलेटी क्रीम लगे पापकार्न की जीएसटी दरें अलग-अलग है। रोटी की दर अलग है तो पराठे की अलग। अलग-अलग बन और बटन लेने पर जीएसटी दर कम है और दोनों को साथ मिलाने पर यह दर बढ़ जाती है। इस प्रकार की भ्रामक स्थिति में कारोबारी गलत रिटर्न भर देते हैं और फिर उन्हें देनदारी का नोटिस आ जाता है और विभागीय कर्मचारी कारोबारियों के पीछे पड़ जाते हैं।
कारोबारियों को आ रही इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलने में समस्याएंकारोबारियों के मुताबिक शुरू में जीएसटी का प्रारूप साधारण था, लेकिन टैक्स चोरी पकड़ने के नाम पर इनमें नए-नए प्रविधान जुड़ते चले गए। व्यापारियों की सबसे बड़ी समस्या इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलने में हो रही दिक्कतों को लेकर है।
कोई कारोबारी किसी दूसरे कारोबारी से माल खरीदता है और दूसरा कारोबारी अगर समय पर जीएसटी रिटर्न नहीं भरता है तो पहले कारोबारी का इनपुट टैक्स रिटर्न फंस जाता है। अगर दूसरा कारोबारी फ्राड निकल जाता है तो भी पहले कारोबारी को इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिल पाता है।
कारोबारियों की शिकायत है जो कारोबारी फ्राड कर रहे हैं या जीएसटी रिटर्न फाइल नहीं कर रहे हैं, उन्हें भी सरकार ने ही जीएसटी व्यवस्था में पंजीकृत किया है, फिर इसमें उनकी क्या गलती है कि उनका इनपुट टैक्स क्रेडिट रोक लिया जाता है।
'जब तक पुराने नियम समझते हैं, तब तक नए नियम आ जाते हैं'दिल्ली सदर बाजार व्यापारी संघ के अध्यक्ष देवराज बवेजा कहते हैं, “पिछले आठ सालों में सैकड़ों नियम बदल चुके हैं और जब तक व्यापारी पुराने नियम को समझता है, नए नियम आ जाते हैं। एचएस कोड को भी समझना छोटे व्यापारियों के लिए परेशानी की बात है।“
असल में जिन वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होता है, उन सभी का हार्मोनाइज्ड सिस्टम या एचएस कोड तय किया जाता है और उन वस्तुओं की जीएसटी दरें भी एचएस कोड के हिसाब से तय होती है।
टैक्स एक्सपर्ट और चार्टर्ड एकाउंटेंट एम.के. गुप्ता कहते हैं कि पहले कारोबारियों के जीएसटी का ऑडिट अनिवार्य था। अब ऑडिट की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। ऐसे में कारोबारी गलती कर बैठते हैं और दो-तीन साल पुरानी गलती से जुड़े उन्हें नोटिस आ रहे हैं तथा उनकी परेशानियों में इजाफा कर रहे हैं।
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