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ग्लोबल पॉपुलेशन में ग्रामीण आबादी के साथ हुआ लोचा? काउंटिंग में नहीं लगाया गया आरबों लोगों का हिसाब; स्टडी में बड़ा खुलासा

ग्लोबल पॉपुलेशन में ग्रामीण आबादी के साथ हुआ लोचा? काउंटिंग में नहीं लगाया गया आरबों लोगों का हिसाब; स्टडी में बड़ा खुलासा

धरती पर इंसानों की कितनी आबादी है इसे लेकर एक स्टडी में कई बातें सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस समय धरती पर इंसानों की आबादी करीब 8.2 बिलियन है और साल 2080 के मिडिल तक ये आंकड़ा 10 बिलियन तक पहुंच जाएगा। स्टडी में पाया गय है कि वैश्विक जनसंख्या की गिनती में ग्रामीण आबादी के एक बड़े हिस्से को शामिल नहीं किया गया।

धरती पर कितनी है इंसानों की आबादी (फाइल फोटो)

 हमारे देश में जातिगत जनगणना को लेकर आए दिन नेताओं द्वारा बातें की जा रही है। इस बीच, धरती पर इंसानों की कितनी आबादी है, इसे लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।


नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में दावा किया गया है कि वैश्विक जनसंख्या की गिनती कम की गई है और अरबों लोगों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

साल 2080 में कितनी हो जाएगी इंसानों की आबादी?


संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक, दुनिया में इस समय इंसानों की आबादी करीब 8.2 बिलियन (820 करोड़) है और ऐसा अनुमान लगाया गया है कि साल 2080 के मध्य तक ये गिनती 10 बिलियन (1 हजार करोड़) तक पहुंच जाएगी।

हालांकि, फिनलैंड में आल्टो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने पाया कि इन अनुमानों में ग्रामीण आबादी के आंकड़े को अंडरकाउंट किया गया है। 1975 से 2010 के बीच ये आंकड़े 53 से 84 प्रतिशत तक हो सकते हैं।


ग्रामीण आबादी की गिनती में लोचा

स्टडी से जुड़े एक पीएचडी स्कॉलर जोसियास लैंग-रिटर ने बताया, पहली बार हमारा अध्ययन इस बात का साक्ष्य देता है कि ग्रामीण आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ग्लोबल पॉपुलेशन डाटा सेट से गायब हो सकता है। उन्होंने कहा कि इन डाटासेट का उपयोग हजारों अध्ययनों में किया गया है।

रिटर ने कहा, ग्रामीण आबादी का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया है। इस स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने पांच सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले ग्लोबल पॉपुलेशन डाटासेट (वर्ल्डपॉप, जीडब्ल्यूपी, जीआरयूएमपी, लैंडस्कैन और जीएचएस-पीओपी) का विश्लेषण किया है।

रिसर्चर्स ने किया बड़ा दावा

शोधकर्ताओं ने दावा किया कि 2012 की जनगणना में शायद पैराग्वे की आबादी का एक चौथाई हिस्सा छूट गया। इस स्टडी में ये भी कहा गया है कि संघर्ष और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों के समुदायों तक पहुंचना कठिन है। जनगणना करने वालों को अक्सर भाषा संबंधी बाधाओं और भागीदारी में प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।
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